अध्याय -३
मदर टेरेसा
पानी पिला ! शांतनु पानी वाले पर रौब मारते हुए कहा '' छूटे पैसे हैं'' पानी वाले
लडके ने उसी अंदाज में दोनों शब्द फेके, शांतनु इधर उधर देखते हुए ''अबे दे दूंगा
यार - एक बात बता रूट नं ८ की बस आई'' ? ''आज मदर टेरेसा नही आई'' पानी
वाले ने गिलास में पानी भरते हुए कहा ''मदर टेरेसा'' !!! शांतनु और राघव दोनों
एक दुसरे की तरफ देखते हुए.... ''मुझे उसका असली नाम नही मालूम है''
पानी वाले ने गिलास बढ़ाते हुए कहा ''मदर टेरेसा'' हा हा हा दोनों जोर जोर से
हंसने लगे, पानी वाले ने भी हंसने में उनका साथ दिया ''आज छुटे नही है कल ले
लियो'' कह कर दोनों तेजी से गेट के अंदर चले गये I
''वो देख यार काली पल्सर'' राघव ने स्कूल के पार्किंग में खड़ी एक मोटरसायकल
की तरफ इशारा करते हुए कहा ''चल साले का हवा निकाल देते हैं'' शांतनु पीठ पर
से स्कूल बैग उतारते हुए कहा और बाईक के पास पहुँच गया, ''मै तो अगले टायर
में चाकू मार दूंगा'' राघव दाँत कीचते हुए कहा ''साला आज से लडकियों को लिफ्ट
देना भूल जायेगा- शांतनु.... देख यही है न वो सीट जिसपे उसने मेरी सायरा को
बिठाया था'' राघव सीट पर चाकू से आठ दस वार करते हुए कहा ''बस यार सीट
फट गया .... मेने अगले पहिये का हवा निकाल दिया तू पिछले पहिये का निकाल
और भाग यहाँ से'' शांतनु हाथ झारते हुए कहा '' कल से साला लड़की पटाना
तो दूर स्कूल में पढना भी छोड़ देगा''राघव पिछले टायर के पास बैठते हुए कहा,
इतने में एक चटाक की जोरदार आवाज के साथ वो जमीन पर गिर गया I
पीठ सहलाते हुए ऊपर देखा तो उसके होश उड़ गए, सामने साइंस के टीचर वी सी
दत्ता थे,तब तक एक गार्ड भी वहाँ दौरते हुए आ पहुंचा, ''तुझे मेरी मोटरसायकल ने क्या
बिगारा था'' मि.दत्ता ने चीखते हुए पूछा, राघव जमीन पर हाथ टेकते हुए उठा और
दाई ओर शांतनु की तरफ देखा पर वो तो जैसे वहाँ से वाष्प बन कर उड़ चूका था,
''सर.. सर..... मै नहीं वो.. तो...'' चटाक... दूसरा चाटा ''सर टायर से हवा भी निकाल
दिया है'' गार्ड ने धीरे चापलूसी से कहा ''क्या नाम है तेरा ....'' सर स .. सारी सर ...
मै..'' राघव कांपते हुए मिन्नत करना चाहा ''आई से वाट इज योर नेम...'' मि दत्ता
फिर चीखे , अचानक राघव के दिमाग ने विपरीत परिस्थिति मै भी शरारती आदत जोर
मारा ''स सर माई नेम इस जवाहर सिंह'' ''गेट आउट फ्राम दिस स्कूल'' मि दत्ता ने
गेट की तरफ इशारा करते हुए कहा, स्कूल से टन टन टन की आवाज आई
और सारे बच्चे अपने अपने क्लास की तरफ भागे I
बाहर शांतनु राघव का इंतजार कर रहा था ''अबे यार उस बूढ़े ने कब बाइक
ले ली'' राघव हारे हुए इन्शान की तरह बैग निचे रखते हुए कहा ''१० तारीख को
उसके बेटे की शादी थी ये पल्सर उसी के दहेज मै आया होगा'' शांतनु बोला
''पर उसका बेटा तो विकलांग है और बैसाखी के सहारे चलता है'' उसने संदेह
जताते हुए कहा ''राघव ! तू समझेगा नही... दहेज लड़का नही चाहता कभी,
उसके माँ बाप को दहेज चाहिए होता है... चल छोड़ ज्यादे तो नही लगी ...''
''ज्यादा लगी तो नही पर उसने अब तक सायद स्कूल से मेरा नाम काट
दिया होगा'' राघव ने उदास होते हुए कहा ''तो क्या उसने तेरा नाम और क्लास
भी पूछा था ???'' ''हाँ यार ... पर डरने की कोई जरूरत नही''....... राघव ४-५
सेकेण्ड के लिए चुप हो गया मैने दत्ता को गलत नाम और क्लास बता दिया
हा हा ..... हा .....दोनो ने एक दुसरे के हाथ पे हाथ मारा और हंसने लगा I
Sunday, February 21, 2010
Sunday, February 7, 2010
अध्याय - २
'' टिम्बर मार्केट''
हेलो - हेलो ......! फायर बिग्रेड ...! हेलो ... एक सरदार मोबाईल से ...'' ऐ साले फ्री वाले
नम्बर होंदे ही ऐसे हैं'' ......! दुबारा से ''हेलो फायर बिग्रेड'' ओह बेटरी खत्म सरदार मोबाईल
को जोर से सर से टकराते हुए कहा और सामने देखा तो उसकी आँख फटी की फटी रह
गई, ''ओए मेरे स्टोर मै भी लग गई''.... और जोर से चिल्लाते हुए आगे की तरफ दौरा.
आग धीरे -धीरे बढ़ता ही जा रहा था कुछ ही समय मै आग पुरे टिम्बर मार्केट में
फैल गया और सब कुछ धू धू कर जलने लगा.कुछ कुत्ते और ढेर सारे चूहे इधर उधर
भाग रहे थे,बहुत दूर से सायरनों की आवाज -लकड़ी एवं कार के जलने की बदबू
माहौल को और भी भयानक बना रहा था,समूचा कीर्ति नगर टिम्बर मार्केट तेल
की तरह जल रहा था चारो तरफ त्राहि-त्राहि मची थी,एसा लग रहा था जैसे
ईस्वर आज ही सब कुछ करने वाले है,किसके साथ न्याय किसके साथ अन्याय,
किसको सजा किसको माफी,किसको जीवन किसको मृत्यु,इशी बीच एक पूंछ जलता
हुआ कुत्ता (शायद उसकी पूंछ किसी गाड़ी से निकले पेट्रोल मै भींग गई थी और
उसमे आग लग गई थी) कही से दौरता आया ... वो दौर दौर के उस पूंछ मै
लगी आग से पीछा छुड़ाना चाहता था वो उसपर कई बार मुंह मारा
और मुंह जलने पर कांय -कांय की आवाज करता दूसरी तरफ भाग गया.
कुछ रुढीवादी और धार्मिक प्रवत्ति वाले लोग कुत्ते को हनुमान का रूप मानकर
शहमे खड़े हाथ जोड़ लेते थे,सायद हनुमान जी ही कुत्ते का रूप धारण कर आग
लगाये होंगे.बहुत दूर खड़े सारे दकानदार और फेक्ट्री वाले अपने -अपने मॉल
का होम होते देख रहे थे और सबके सब मोबाईल अपने कान में लगाए थे ,
कुछ लोग सुभ सुचना अपने घर में दे रहे थे तो कोई बेहद दुखद. जिसके दुकान
में आज ज्यादा माल था वो बहुत दुखी था जिसके दुकान में कम माल था वो
अभी से केल्कुलेसन लगाने लग गया था क़ि ५ लाख का माल जला है
५० लाख का क्लेम मांगूंगा २५ लाख तो मिल ही जायेगा , उन्ही दुकानदारों
में से एक अशोक मेहरा नाम का दुकानदार फोन पे बात करते करते बेहोश
होके गिर पड़ा,हमेशा क़ि तरह सबकुछ हो जाने के बाद एम्बुलेंस,पुलिस
और सबसे अंत में फायर बिग्रेड क़ि खटारा गारियाँ आई और राख को
कीचर में में तब्दील करने लगी,अब बारी थी मिडिया बालों क़ि जो दिन
भर टी वी में विज्ञापन दिखा के बोड़ हो गये थे वे लोग उश कीचड़ में फुटबाल
खेलने लगे ''ये देखिये जली हुई लकड़ी... ये कैसी लग रही है'' एक लड़की
रिपोर्टर केमरा को दिखाते हुई बोली ऐसे जैसे वो जली लकड़ी नही बल्कि
चाँद या मंगल ग्रह से लाया हुआ कोई खास पत्थर हो, कम से कम २०-२५
न्यूज चेनल का लाइव टेलीकास्ट वैन आ गया और चारो तरफ से मार्केट
को जाम कर दिया.उश अग्नि कांड में कुछ लोग जख्मी हुए थे और एक
आदमी क़ि मृत्यु हो गई थी,यह खबर पूरी दिल्ली में आधे घंटे में फैल
गई.आग कैसे लगी ये किसी को पता नही लगा, अगले दिन अख़बार में
बस यही छपा क़ि मुख्य मंत्री ने अग्निकांड के जाँच के आदेश दे दिए है.
Tuesday, February 2, 2010
हर जनम (एक लघु उपन्यास)
अध्याय - १
(चेरिटी)
कहते है पहली मुलाकात दिल पे एसा असर डालता है कि वो मुलाकात
और उसका असर मन में हमेशा के लिए रह जाता है.सांतनु पहली बार
शिल्पी को चेरिटी करते हुए देखा था. ''आह'' भिखारी के मुंह से आवाज
आई और उसका कटोरा हाथ से गिर कर सड़क पे लुढकने लगा,स्कूल
बस से उतरते हुए शिल्पी ने वो 'आह' और कटोरा लुढकने कि आवाज
सुनी, वो भिखारी हमेशा स्कूल के गेट के पास एक लकड़ी की ट्राली में
बैठे भीख मांगता रहता था, उसका एक पैर और एक हाथ नहीं था
उसके पैर में कभी नहीं छूटने वाला एक घाव था जिस पर हमेशा
मख्खियाँ मडराती रहती थी शिल्पी आवाज सुनकर मुड़ी उसने देखा की
भिखारी को कुछ दर्द महशुस हो रहा है उसका काटोरा उससे दूर पड़ा
है जिसे वो उठाने की की कोशिस कर रहा है वो उसके पास गयी और
कटोरा देते हुए 'आप को क्या तकलीफ है कराह क्यों रहे है आप' 'इसमें
मेरा घाव दब गया था' ट्राली की एक नोंक की तरफ इशारा करते हुए
उसने कहा, शिल्पी उसके घाव की तरफ लाचारी भाव से देखते हुए बोली
आप इसमें कोई दवाई नही लगाते ?..... दवाई बहुत महगी है बेटी
मै इसमें शुती कपड़े का राख लगाता हूँ, शांतनु और उसका दोस्त
रघाव, पास में पानी वाले के साथ छुट्टे के लिए लड़ता हुआ ये सब देख
रहा था '२ गिलास पानी पिया १० का नोट दे रहा है' १०-११ साल के पानी
बेचने वाले लडके ने गुस्से से कहा 'अबे पूरा ट्राली पी जाऊ क्या सूबे -सूबे
राघव ने उसी अंदाज में उससे कहा 'यार तू दो रुपया काट ले अकड़ मत,'
शांतनु ने शांति से कहा, शिल्पी अपने स्कूल बैग से एक ५० का नोट
निकाली और भिखारी की तरफ बढ़ाते हुए 'ये लीजिये मेरे पास ५०
रूपए पड़े है इससे आप दवाई ले लिजियेगा और हाँ आप कोई काम
कर सकते है मेरा मतलब नौकरी...!' भिखारी नोट पकरते हुए ऊपर ऐसे
देखा जैसे उसके सामने कोई देवी खड़ी हो और उसे वरदान मांगने को
कह रही हो 'मेरे पापा का कीर्ति नगर में टिम्बर का काम है आप चाहें
तो वहाँ दिन में लकड़ियों की चौकीदारी का काम कर सकते है' शिल्पी
पुरे आत्मविश्वास से बोली 'ये ले पकड़ ९ रूपये, लडकियों को देखता है
साला आंख का पावर कम हो जायेगा' पानी वाला एक भींगा ५ का
नोट और कुछ छूटे देते हुए कहा,शांतनु बिना गिने पैसे को उपर के जेब
में फेक दिया,ऐसे जैसे कोई टिसू पेपर को इस्तेमाल के बाद फेकता है,
'पैसे पुरे थे न...! चल एक गिलास पानी और पिला' शांतनु शिल्पी की
तरफ देखते हुए कहा,पानी वाला शांतनु को घूरते हुए पानी निकालने
लगा,दरअसल शांतनु को वहाँ खड़े रहने के लिए और एक गिलास पानी
पीने के अलावा कोई और बहाना नहीं था.'आप कहें तो मै पापा से बात
करूं 'शिल्पी आशापूर्ण नजर से भिखारी की ओर देखते हुए बोली 'बेटी
बड़ी मेहरवानी होगी तुम्हारी और तुम्हारे पिताजी की यदी मुझे वो काम
मिल जाय'. उसने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा 'मै आज ही पापा से बात
करूंगी' कहके शिल्पी अपने दो और शहेलियों के साथ तेजी से गेट के
अन्दर चली गई.
'भिखारी जेनुअन लगता है यार' वरना डेड दो हजार की नौकरी लिए
कोई भिखारी भीख मांगना क्यों छोड़ेगा वो भी दिल्ली का भिखारी.' राघव
अपने दाएँ गाल को एक ऊँगली से खुजाते हुए कहा 'मुझे तो वो
लड़की उससे भी ज्यादा जेनुअन लगी यार, शांतनु मन ही मन सोचा,
और बोला 'हाँ यार वाकई मजबूर भिखारी लगता है' उसने आधा गिलास
बचा हुआ पानी और एक अठन्नी ट्राली पर पटकते हुए कहा चल भाई
हम लेट हो रहे है घंटी बजने बाली है. शांतनु स्कूल के अन्दर जाते हुए
भी मैदान मे उसी दयालु लड़की को ढूंढ रहा था.
(चेरिटी)
कहते है पहली मुलाकात दिल पे एसा असर डालता है कि वो मुलाकात
और उसका असर मन में हमेशा के लिए रह जाता है.सांतनु पहली बार
शिल्पी को चेरिटी करते हुए देखा था. ''आह'' भिखारी के मुंह से आवाज
आई और उसका कटोरा हाथ से गिर कर सड़क पे लुढकने लगा,स्कूल
बस से उतरते हुए शिल्पी ने वो 'आह' और कटोरा लुढकने कि आवाज
सुनी, वो भिखारी हमेशा स्कूल के गेट के पास एक लकड़ी की ट्राली में
बैठे भीख मांगता रहता था, उसका एक पैर और एक हाथ नहीं था
उसके पैर में कभी नहीं छूटने वाला एक घाव था जिस पर हमेशा
मख्खियाँ मडराती रहती थी शिल्पी आवाज सुनकर मुड़ी उसने देखा की
भिखारी को कुछ दर्द महशुस हो रहा है उसका काटोरा उससे दूर पड़ा
है जिसे वो उठाने की की कोशिस कर रहा है वो उसके पास गयी और
कटोरा देते हुए 'आप को क्या तकलीफ है कराह क्यों रहे है आप' 'इसमें
मेरा घाव दब गया था' ट्राली की एक नोंक की तरफ इशारा करते हुए
उसने कहा, शिल्पी उसके घाव की तरफ लाचारी भाव से देखते हुए बोली
आप इसमें कोई दवाई नही लगाते ?..... दवाई बहुत महगी है बेटी
मै इसमें शुती कपड़े का राख लगाता हूँ, शांतनु और उसका दोस्त
रघाव, पास में पानी वाले के साथ छुट्टे के लिए लड़ता हुआ ये सब देख
रहा था '२ गिलास पानी पिया १० का नोट दे रहा है' १०-११ साल के पानी
बेचने वाले लडके ने गुस्से से कहा 'अबे पूरा ट्राली पी जाऊ क्या सूबे -सूबे
राघव ने उसी अंदाज में उससे कहा 'यार तू दो रुपया काट ले अकड़ मत,'
शांतनु ने शांति से कहा, शिल्पी अपने स्कूल बैग से एक ५० का नोट
निकाली और भिखारी की तरफ बढ़ाते हुए 'ये लीजिये मेरे पास ५०
रूपए पड़े है इससे आप दवाई ले लिजियेगा और हाँ आप कोई काम
कर सकते है मेरा मतलब नौकरी...!' भिखारी नोट पकरते हुए ऊपर ऐसे
देखा जैसे उसके सामने कोई देवी खड़ी हो और उसे वरदान मांगने को
कह रही हो 'मेरे पापा का कीर्ति नगर में टिम्बर का काम है आप चाहें
तो वहाँ दिन में लकड़ियों की चौकीदारी का काम कर सकते है' शिल्पी
पुरे आत्मविश्वास से बोली 'ये ले पकड़ ९ रूपये, लडकियों को देखता है
साला आंख का पावर कम हो जायेगा' पानी वाला एक भींगा ५ का
नोट और कुछ छूटे देते हुए कहा,शांतनु बिना गिने पैसे को उपर के जेब
में फेक दिया,ऐसे जैसे कोई टिसू पेपर को इस्तेमाल के बाद फेकता है,
'पैसे पुरे थे न...! चल एक गिलास पानी और पिला' शांतनु शिल्पी की
तरफ देखते हुए कहा,पानी वाला शांतनु को घूरते हुए पानी निकालने
लगा,दरअसल शांतनु को वहाँ खड़े रहने के लिए और एक गिलास पानी
पीने के अलावा कोई और बहाना नहीं था.'आप कहें तो मै पापा से बात
करूं 'शिल्पी आशापूर्ण नजर से भिखारी की ओर देखते हुए बोली 'बेटी
बड़ी मेहरवानी होगी तुम्हारी और तुम्हारे पिताजी की यदी मुझे वो काम
मिल जाय'. उसने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा 'मै आज ही पापा से बात
करूंगी' कहके शिल्पी अपने दो और शहेलियों के साथ तेजी से गेट के
अन्दर चली गई.
'भिखारी जेनुअन लगता है यार' वरना डेड दो हजार की नौकरी लिए
कोई भिखारी भीख मांगना क्यों छोड़ेगा वो भी दिल्ली का भिखारी.' राघव
अपने दाएँ गाल को एक ऊँगली से खुजाते हुए कहा 'मुझे तो वो
लड़की उससे भी ज्यादा जेनुअन लगी यार, शांतनु मन ही मन सोचा,
और बोला 'हाँ यार वाकई मजबूर भिखारी लगता है' उसने आधा गिलास
बचा हुआ पानी और एक अठन्नी ट्राली पर पटकते हुए कहा चल भाई
हम लेट हो रहे है घंटी बजने बाली है. शांतनु स्कूल के अन्दर जाते हुए
भी मैदान मे उसी दयालु लड़की को ढूंढ रहा था.
Tuesday, January 26, 2010
जय हिंद
दोस्तों आज हम भारतीय गणतन्त्र के ६१ वें साल में कदम रख चुके
हैं, ६० साल बीत चूका है, निस्संदेह हम इन ६० सालों में सुई से लेकर
हवाई जहाज तक बनाने लग गये, विदेश पर निर्भरता काफी हद तक कम
हो गई है, देश समृद्ध हुआ है,मध्यम तबके के लोग धनी - धनी लोग
उद्योगपति और कल के उद्योगपति आज कुबेर है,
मैं आज ६१ वें साल भारतीय गणतंत्र पर इल्जाम लगाने जा रहा
हूँ, गांधीजी के शब्द थे ''भारत गांव का देश है'' ये वो वाक्य है जो हमें
स्कूल में भी पढाया गया था,इश वाक्य की तुलना मैं एश्वर्या राय के
उस वाक्य से करूँगा जो उन्होंने विश्व सुन्दरी प्रतियोगता के दौरान कही
थी ''मैं अपने आँखों का दान इश लिए करना चाहूंगी कि कोई अँधा भी
इश खूबसूरत दुनियां को देख सके'' खूबसूरत दुनियां जी हाँ ---------!
एक शहर में रहने बाली २० साल कि लड़की - जिसके हिसाब से ये
दुनियां खुबशूरत है,उसी क़ी उम्र कि एक गांव में रहने वाली बूढी माँ,
जो कुपोषण का शिकार हो कर मृत्युशय्या पर पड़ी है से हमारे समाज
ने या सारकार ने आज तक पूछा है? क़ी ये दुनियां कैसी है? दुनियां क़ी
बात तो छोरिये उससे तो किसी ने आज तक ये नहीं पूछा क़ी हास्पिटल
कैसा होता है,स्कूल कैसा होता हैं,पक्की सड़क कैसी होती है, जो देश
गांव में रहता है जिस पर देश का वजूद टिका है क्या वो आज तक
खुबशुरत हुआ है ? क्या गांव में आज तक मुजिकल फव्वारा बना है,
किसी एम्युजमेंट पार्क का निर्माण हुआ है,क्या किसी निर्जन और निधन
आदिवासी इलाके में मल्टी स्पेसियेलिती हास्पिटल बना है ??? इन
सम्पन्न चीजों को तो जाने दीजिये - यहाँ तक क़ी बुनियादी जरुरत जैसे
बिजली पानी सडक तक क़ी व्यवस्था आज तक नहीं हो पाया है- ये भी
जग विदित है क़ी देश के कई भागों में लोग भूख मरी के चपेट में है 1
बड़ी विडंबना है क़ी शहर क़ी एक १८ साल क़ी लड़की कंडोम क़ी ब्रांड
एम्बेसडर बन जाती है और उशे हाथ में लेकर टी वी पर व्यापारिक विज्ञापन
करती है वहीँ गांव का एक तीस -चालीस साल का व्यक्ति परिवार नियोजन
का तरीका तक नहीं जनता. इतना फर्क शहर और देहात में ???.
निश्चय ही हम तरक्की के रास्ते पर नहीं है साठ साल कम नहीं
होते,यदि सरकार या पब्लिक ये सोचती है क़ी हम अब परमाणु संपन्न देश
हैं और हमें अपने देश पर गर्व करना चाहिए तो मैं कहता हूँ वो गलत
हैं, गांव,देहात और पिछरे इलाके के आदिवासी जिस हालत में ७० -८०
साल पहले जीते थे उशी हालत में आज भी जीते हैं,उन्होंने आजादी शब्द सुना
जरुर होगा लेकिन महशुस कभी नहीं किया, उन्होंने तिरंगा को देखा
जरुर है लेकिन आजादी के रूप में नहीं एक कपड़े के रूप में, वो किस खुसी
में गणतंत्र दिवस मनाएं, सारकार और समाज को चाहिए क़ी देहात को
भी विकास का सामान अवसर दे, क्योकि जो उन्मुक्क्त आजादी न दे वो
देश कैसा - और जो न्याय सम्मान एवं अनंत अवसर न दे वो सारकार
कैसा.
जय हिंद,
मेरा भारत महान नहीं कहूँगा.......................................................
दोस्तों आज हम भारतीय गणतन्त्र के ६१ वें साल में कदम रख चुके
हैं, ६० साल बीत चूका है, निस्संदेह हम इन ६० सालों में सुई से लेकर
हवाई जहाज तक बनाने लग गये, विदेश पर निर्भरता काफी हद तक कम
हो गई है, देश समृद्ध हुआ है,मध्यम तबके के लोग धनी - धनी लोग
उद्योगपति और कल के उद्योगपति आज कुबेर है,
मैं आज ६१ वें साल भारतीय गणतंत्र पर इल्जाम लगाने जा रहा
हूँ, गांधीजी के शब्द थे ''भारत गांव का देश है'' ये वो वाक्य है जो हमें
स्कूल में भी पढाया गया था,इश वाक्य की तुलना मैं एश्वर्या राय के
उस वाक्य से करूँगा जो उन्होंने विश्व सुन्दरी प्रतियोगता के दौरान कही
थी ''मैं अपने आँखों का दान इश लिए करना चाहूंगी कि कोई अँधा भी
इश खूबसूरत दुनियां को देख सके'' खूबसूरत दुनियां जी हाँ ---------!
एक शहर में रहने बाली २० साल कि लड़की - जिसके हिसाब से ये
दुनियां खुबशूरत है,उसी क़ी उम्र कि एक गांव में रहने वाली बूढी माँ,
जो कुपोषण का शिकार हो कर मृत्युशय्या पर पड़ी है से हमारे समाज
ने या सारकार ने आज तक पूछा है? क़ी ये दुनियां कैसी है? दुनियां क़ी
बात तो छोरिये उससे तो किसी ने आज तक ये नहीं पूछा क़ी हास्पिटल
कैसा होता है,स्कूल कैसा होता हैं,पक्की सड़क कैसी होती है, जो देश
गांव में रहता है जिस पर देश का वजूद टिका है क्या वो आज तक
खुबशुरत हुआ है ? क्या गांव में आज तक मुजिकल फव्वारा बना है,
किसी एम्युजमेंट पार्क का निर्माण हुआ है,क्या किसी निर्जन और निधन
आदिवासी इलाके में मल्टी स्पेसियेलिती हास्पिटल बना है ??? इन
सम्पन्न चीजों को तो जाने दीजिये - यहाँ तक क़ी बुनियादी जरुरत जैसे
बिजली पानी सडक तक क़ी व्यवस्था आज तक नहीं हो पाया है- ये भी
जग विदित है क़ी देश के कई भागों में लोग भूख मरी के चपेट में है 1
बड़ी विडंबना है क़ी शहर क़ी एक १८ साल क़ी लड़की कंडोम क़ी ब्रांड
एम्बेसडर बन जाती है और उशे हाथ में लेकर टी वी पर व्यापारिक विज्ञापन
करती है वहीँ गांव का एक तीस -चालीस साल का व्यक्ति परिवार नियोजन
का तरीका तक नहीं जनता. इतना फर्क शहर और देहात में ???.
निश्चय ही हम तरक्की के रास्ते पर नहीं है साठ साल कम नहीं
होते,यदि सरकार या पब्लिक ये सोचती है क़ी हम अब परमाणु संपन्न देश
हैं और हमें अपने देश पर गर्व करना चाहिए तो मैं कहता हूँ वो गलत
हैं, गांव,देहात और पिछरे इलाके के आदिवासी जिस हालत में ७० -८०
साल पहले जीते थे उशी हालत में आज भी जीते हैं,उन्होंने आजादी शब्द सुना
जरुर होगा लेकिन महशुस कभी नहीं किया, उन्होंने तिरंगा को देखा
जरुर है लेकिन आजादी के रूप में नहीं एक कपड़े के रूप में, वो किस खुसी
में गणतंत्र दिवस मनाएं, सारकार और समाज को चाहिए क़ी देहात को
भी विकास का सामान अवसर दे, क्योकि जो उन्मुक्क्त आजादी न दे वो
देश कैसा - और जो न्याय सम्मान एवं अनंत अवसर न दे वो सारकार
कैसा.
जय हिंद,
मेरा भारत महान नहीं कहूँगा.......................................................
Sunday, January 17, 2010
रिश्वत के देवता
आज कल नित नये दिन अख़बार में खबर छपता है कि अमुक व्यक्ति ने फलाने चेरिटेबल ट्रस्ट को ५० लाख दान में दिए,फलां अभिनेता को उश चेरिटेबल ट्रस्ट का
अम्बेसडर बनाया गया है,किसी दिन सुनने को मिलता है तिरुपति बालाजी को किसी
भक्त ने सवा करोड़ रूपये दान में दिए,कभी सिरडी सांई को लाखो के स्वर्ण आभूषण
मिले,
जागो हे रिश्वत के देवता - जागो, और अपने परम प्रिय और सम्पन्न भक्तों को बता दो कि में मंदिर मस्जिद में नहीं रहता हूँ,रूपये पैसो में मेरा मोह नहीं है क्योंकि मुझे
रोटी नहीं खाने परते, कपडे नहीं पहनने पड़ते , घर नहीं बनाने परते, इन रूपये पैसो कि
जहाँ जरुरत है वहां दो,बड़े ही दुर्भाग्य कि बात है कि जिस देश का राजा प्रजा है उस
देश में भी प्रजा भूखे मरता ,कहीं एक -एक दाने के लिए लोग तरसते है कही सोने के
सिक्के मंदिर में चढ़ाये जाते हैं ,एक कोशोर बेटे को स्कूल भेजने कि जगह पिता
मजबूरन दूर शहर मजदूरी के लिए भेजता है,बेटी कि व्याह करने कि जगह बाप
किसी दलाल के हाथ बेचना उचित समझता है,कहीं हाहाकार मचा है कहीं हा-हा हो रहा है.... जागो हे रिश्वत के देवता..............
मंदिर तेरा मस्जिद तेरा,
गुरूद्वारे और गिरिजाघर,
नेता की कोठी को देखा,
बाबू बनाया अपना घर,
आन बान और शान बनाया,
बनियाँ देखे डंडी पर,
रिश्वत के ईस्वर मंदिर छोडो,
जा तू दीन के धरती पर,
Tuesday, January 5, 2010
वादियाँ
साथ चलते रहे दूर तक,
ये धरती ये अम्बर जहाँ तक,
ये नज़ारे ये सितारे,
ये चंदा ये चितवन ,
क्या चंचल है मौसम,
छेरे उसे बादल दूर तक,
नादान तुम नादां हें हम
अनजान तुम अनजान हम,
ये झरना न नादान है,
बल खा के चलती है,
पपीहों को छेरती है ,
पागल पवन दूर तक ,
मुकुट पहना ये पर्वत,
नदियों कि कलरव,
सूरज की किरने ,
सोने के गहने,
बहती है चलती है,
गले सबसे मिलती है,
फूल हो या पत्थर,
साथ चलते रहे दूर तक,
साथ चलते रहे दूर तक ,
साथ चलते रहे दूर तक,
ये धरती ये अम्बर जहाँ तक,
ये नज़ारे ये सितारे,
ये चंदा ये चितवन ,
क्या चंचल है मौसम,
छेरे उसे बादल दूर तक,
नादान तुम नादां हें हम
अनजान तुम अनजान हम,
ये झरना न नादान है,
बल खा के चलती है,
पपीहों को छेरती है ,
पागल पवन दूर तक ,
मुकुट पहना ये पर्वत,
नदियों कि कलरव,
सूरज की किरने ,
सोने के गहने,
बहती है चलती है,
गले सबसे मिलती है,
फूल हो या पत्थर,
साथ चलते रहे दूर तक,
साथ चलते रहे दूर तक ,
साथ चलते रहे दूर तक,
Saturday, January 2, 2010
यदा यदा ही धर्मस्य
पुराने ज़माने कि बात है किसी भूभाग पर दो राजा राज करते थे उन दोनों राजाओ के बीच
हमेशा राज्य कि सीमा को लेकर विवाद रहता था,दोनों ही रजा एक दुसरे के राज्य के अन्दर अपनी सीमा बताते
थे पीछे हटने का कोई नाम न लेता था,इश वजह से एक बार युद्ध छिर गया बहुत ही घमासान लड़ाई हुई, बहुत सारे
निर्दोष प्रजा मारे गए ,यह देख कर क्रुद्ध प्रजा ने एक दिन युद्ध के ही मैदान में दोनों राजाओ को घेर कर अंत कर
दिया. राजाओ के मरते ही मातम के जगह हर्ष आ गया सब लोग आपस में गले मिलने लगे,लोगो ने दोनों ही राजा को
एक ही जगह पास पास संस्कार कर दिया और समाधि बना कर बीच में एक बाबुल का पेड़ लगा दिया, ताकि
भविष्य में कोई उन क्रूर रजा के समाधि के पास न जा सके.
कहते है जीवित रहते अच्छे कर्म करने से मृत्युबाद आत्मा को सुख शांति मिलती है,लेकिन ये बात कोई नहीं
जनता कि मरने के बाद हमारा क्या होता है पर इतना तय है कि हमारे अच्छे कर्म करने से समाज कि संवेदना
मृत्युपर्यंत हमारे साथ रहती है.तभी तो समाधि पर कोई दिया जलाता है कोई पुष्प चढ़ाता है कोई तुलसी तो कोई
बरगद का पेड़ लगाता है ताकि कभी बहुत सारे लोग उस पेड़ के निचे थकान मिटा सके, रजा के मृत्यु का समाचार सुन कर कुम्हार जिसे राजा ने बिना किसी दोष के देश निकला दे दिया था, वापस आया तो देखा दोनों राज्यों को
फूलो से सजाया जा रहा था जगह जगह ढोल नगारे बज रहे थे दिवाली सा माहौल था,अगले दिन दोनों राज्यों को
मिलकर एक राज्य बनाना और नए राजा का चुनाव होना था,कुम्हार फिर भी डरा हुआ था उसे विश्वास नहीं हो रहा था
कि राजा अब नहीं है लेकिन जब उसकी पत्नी और बच्चे जो उनसे १५ साल बाद मिल रहे थे, ने कहा तो उसे विस्वाश हो गया .कुछ देर कुम्हार राजा के बरे में सोचता रहा फिर अपने बच्चो से बोला राजा आखिर राजा होता है चाहे वो क्रूर और पापी क्यों न हो वो जैसा था वैसे सजा उसे मिल गयी.अब मुझे उन्हें श्रधांजलि देने के लिए जाना चाहिए और वो पहुच गया समाधि पर,वहां उसने देखा दोनों राजा सुच्म शरीर में रहते हुए भी बबूल पेड़
कि थोरी सी छांव के लिए लड़ रहे है,उश छांव के लिए जिस पर किसी का अधिकार नहीं हो सकता, जो सूर्य कि
रोशनी के साथ जगह बदलता है. उश पेड़ पर एक प्रेत ने डेरा डाल रक्खा था वो दोनों का झगरा बरे चाव से देख रहा
था,यह देख कर कुम्हार बोला आप इन दोनों को आपस में समझौता क्यों नहीं करा देते,प्रेत ने जवाब दिया- मै झगरा देख नहीं झगरा करवा रहा हूँ ताकि तुम अपने बच्चों के साथ शांति से रहो.
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