Tuesday, February 2, 2010

हर जनम (एक लघु उपन्यास)

                                 अध्याय - १


                                                         (चेरिटी)
         


कहते है पहली  मुलाकात दिल पे एसा असर डालता है कि वो मुलाकात
 और उसका असर मन में हमेशा के लिए रह  जाता है.सांतनु पहली बार 
शिल्पी को चेरिटी करते हुए देखा था. ''आह'' भिखारी के मुंह से आवाज 
आई और उसका कटोरा हाथ से गिर कर सड़क पे लुढकने लगा,स्कूल
बस से उतरते हुए शिल्पी ने वो 'आह' और कटोरा लुढकने कि आवाज 
सुनी, वो भिखारी हमेशा स्कूल के गेट के पास एक लकड़ी की ट्राली में
बैठे भीख मांगता रहता था, उसका एक पैर और एक हाथ नहीं था 
उसके पैर में कभी नहीं छूटने वाला एक घाव था जिस पर हमेशा
मख्खियाँ मडराती रहती थी शिल्पी आवाज सुनकर मुड़ी उसने देखा की 
भिखारी को कुछ दर्द महशुस हो रहा है उसका काटोरा उससे दूर पड़ा 
है जिसे वो उठाने की की कोशिस कर रहा है वो उसके पास गयी और 
कटोरा देते हुए 'आप को क्या तकलीफ है कराह क्यों रहे है आप'  'इसमें
मेरा घाव दब गया था' ट्राली की एक नोंक की तरफ इशारा करते हुए 
उसने कहा, शिल्पी उसके घाव की तरफ लाचारी भाव से देखते हुए बोली 
आप इसमें कोई दवाई नही लगाते ?..... दवाई बहुत महगी है बेटी
मै इसमें शुती कपड़े का राख लगाता हूँ, शांतनु और उसका दोस्त 
रघाव, पास में पानी वाले के साथ छुट्टे के लिए लड़ता  हुआ  ये सब देख 
रहा था '२ गिलास  पानी पिया १० का नोट दे रहा है' १०-११ साल के पानी 
बेचने वाले लडके ने गुस्से से कहा 'अबे पूरा ट्राली पी जाऊ क्या सूबे -सूबे 
राघव ने उसी अंदाज में उससे कहा 'यार तू दो रुपया काट ले अकड़ मत,'
शांतनु ने शांति से कहा, शिल्पी अपने स्कूल बैग से एक ५० का नोट
निकाली और भिखारी की तरफ बढ़ाते हुए 'ये लीजिये मेरे पास ५० 
रूपए पड़े है इससे आप दवाई ले लिजियेगा और हाँ आप कोई काम 
कर सकते है मेरा मतलब नौकरी...!' भिखारी नोट पकरते हुए ऊपर ऐसे 
देखा जैसे उसके सामने कोई देवी खड़ी हो और उसे वरदान मांगने को 
कह रही हो 'मेरे पापा का कीर्ति नगर में टिम्बर का काम है आप चाहें 
तो वहाँ दिन में लकड़ियों की चौकीदारी का काम कर सकते है' शिल्पी 
 पुरे आत्मविश्वास से बोली 'ये ले पकड़ ९ रूपये, लडकियों को देखता है 
  साला आंख का पावर कम हो जायेगा' पानी वाला एक भींगा ५ का 
नोट और कुछ छूटे देते हुए कहा,शांतनु  बिना गिने पैसे को उपर के जेब 
में फेक दिया,ऐसे जैसे कोई टिसू पेपर को इस्तेमाल के बाद फेकता है, 
'पैसे पुरे थे न...! चल एक गिलास पानी और पिला'  शांतनु शिल्पी की
 तरफ देखते हुए कहा,पानी वाला शांतनु को घूरते हुए पानी निकालने
लगा,दरअसल शांतनु को वहाँ खड़े रहने के लिए और एक गिलास  पानी 
पीने के अलावा कोई और बहाना नहीं था.'आप कहें तो मै पापा से बात 
करूं 'शिल्पी आशापूर्ण नजर से भिखारी की ओर देखते हुए बोली 'बेटी 
बड़ी मेहरवानी होगी तुम्हारी और तुम्हारे पिताजी की यदी मुझे वो काम 
मिल जाय'. उसने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा 'मै आज ही पापा से बात 
करूंगी' कहके शिल्पी अपने  दो और शहेलियों  के साथ तेजी से गेट के 
अन्दर चली गई.
     'भिखारी जेनुअन लगता है यार' वरना डेड दो हजार की नौकरी लिए
कोई भिखारी भीख मांगना क्यों छोड़ेगा वो भी दिल्ली का भिखारी.' राघव 
अपने दाएँ गाल को एक ऊँगली से खुजाते हुए कहा 'मुझे तो वो 
लड़की उससे भी ज्यादा जेनुअन लगी यार, शांतनु मन ही मन सोचा,
और बोला 'हाँ यार वाकई मजबूर भिखारी लगता है' उसने आधा गिलास
बचा हुआ  पानी और एक अठन्नी ट्राली पर पटकते हुए कहा चल भाई
 हम लेट हो रहे है घंटी बजने बाली है. शांतनु स्कूल के अन्दर जाते हुए
  भी मैदान मे  उसी दयालु लड़की को ढूंढ रहा था.                      




 






     




   



  

    









    

    

                                    

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