अध्याय - ४
जीन
''क्या हाल है छोटू'' पानी के ट्राली पर हाथ मारते हुए शांतनु
ने पूछा ''१० के छुटे है क्या तेरे पास'' पानी वाले ने जवाब के
रूप में शांतनु से पूछा ''अबे घोंचू !छुटे होते तो उस भिखारी को
भीख नही दे दिया होता'' भिखारी की तरफ इशारा करते हुए
राघव ने कहा '' चल पानी पिला ५ का सिक्का पड़ा है मेरे पास
कल का भी बाकि है तेरा'' ''थोडा सा जीन डाल दूँ '' पानी वाले ने
आँख मारते हुए पूछा, ''जीन क्या होता है'' शांतनु ने पूछा ''अबे तू जीन
भी रखता है....... शराब !!! शांतनु की तरफ घूमते हुए राघव ने कहा,
शांतनु हाथ उपर उठाके पानी वाले को थप्पर दिखाते हुए ''कमीने !
मार डालूँगा.... कल हम स्कूल से सस्पेंड होते होते बचे और आज तू
शराब पिला के क्लास में भेजेगा, अरे यार इससे बदबू नही आती ....
किसी को पता भी नही चलेगा ... तभी तो मेरा धंधा चंगा चल रहा है
वरना ये ठेला बेच के कब का मै देवरिया चला गया होता, पानी बेच
के तेरा पेट नही पलता ? शांतनु ने पूछा ''अपना पेट तो पल जाता है
पर उसका पेट कौन पालेगा, बोल डालूं ?'' सामने रोड के किनारे पुलिस की
जिप्सी की तरफ इशारा करते हुए उसने कहा, हाँ यार मुझे भी पता है
जीन से बदबू नही आती,राघव ने ललचाई नजरों से कहा,तो क्या कहता
है ? चल मार लेते है एक एक.... फिर मीठी सुपारी लेंगे.शांतनु ने सहमति
मन से कहा, लेकिन पीने के बाद तू अंग्रेजी में तो बात नही करने
लगेगा,राघव चेतावनी देते हुए बोला I
दोनों पीने के बाद ग्लास ट्राली पे रख ही रहे थे की बस आ गई,
सारे बच्चे बस से उतरने लगे,उन्हीं बच्चों में एक शिल्पी भी थी ''ये लीजिए
इसमें आपके लिए खाना है'' भिखारी को एक टिफिन देते हुए ''और मुझे
माफ़ कीजिएगा मै आपकी कोई मदद नही कर पाई'' उसकी आँखे भरी हुई
थी ''क्या हुआ बेटी कल तुम स्कूल नही आई थी'' भिखारी ने शिल्पी की
तरफ देखते हुए पूछा ''हाँ बाबा परसों रात कीर्ति नगर टिम्बर मार्केट में
आग लग गई थी, पूरा मार्केट जल गया उसमे मेंरे पापा का भी दुकान
था'' भिखारी बिना कुछ बोले सर झुका लिया, शिल्पी और ज्यादा देर तक
वहाँ खड़ी नही रह पाई और अंदर की तरफ चली गई,आंसू आने से उसकी
आँखे लाल और चमकदार हो गई थी,शांतनु में घूंट पीने के बाद हिम्मत
आ गई थी वो शिल्पी की तरफ दौरा ''स्क्यूज मि....!शिल्पी रुकी और
पीछे मुर के शांतनु की ओर देखी, ''हाय आई एम शांतनु एलेवन्थ क्लास''
''आई एम शिल्पी ट्व्ल्थ'' सुन के शांतनु थोडा मायूस हुआ उसने पहली
बार जिस लड़की को चाहा था वो उससे एक क्लास सीनियर थी फिर भी
तुरंत उसने अपने आप को सम्हाला और ''क्या कीर्ति नगर में तुम्हारा भी
दुकान था.... मैने अभी अभी उस भिखारी को कहते हुए सुना है .....I
''हाँ वहाँ मेरे पापा का बहुत बड़ा बिजनस था'' शिल्पी ने शांतनु की तरफ
देखते हुए जवाब दिया, ये मौका शांतनु के जिन्दगी में पहलीबार आया
था की एक खुबशुरत लड़की उसकी तरफ उसके सामने भरपूर आँखों से
देख रही थी, गोल सा चेहरा बड़ी बड़ी आँखें ....सुराही जैसे गर्दन पर लटकते
काले काले बाल, वो तो कुछ सेकेण्ड के लिए उस खुबशुरत पड़ी को देखते
ही रह गया, फिर कहा ''वहाँ मेंरे मामा जी का भी दुकान था'' ''ओह सो sad
अब तो शायद कुछ भी नही बचा होगा ......., शिल्पी ने मायूसी से कहा
हाँ'' शांतनु ने सर हिलाया तब तक वहाँ राघव आ गया ''चल भाई घंटी
बज चुकी है ....,और दोने वहाँ से क्लास की तरफ चले गए I
कहते है भविष्य का पेड़ वर्तमान के अंकुर से ही बनता है, शिल्पी
के मन में भी आज पहली बार किसी लडके के लिए अंकुर फुटा था,
सायद इशे शांतनु की मासूमियत कहें या जीन का प्रभाव वो आज एक
खूब शूरत लड़की को प्रभावित कर गया था, उधर शांतनु भी क्लास रूम
की तरफ जाते हुए मन ही मन बहुत सारी बातें सोच रहा था, वो सोच
रहा था अभी इश समय का एहसास जिसकी खुशियाँ वो सम्हाल
नही पा रहा था .... वो सोच रहा था शिल्पी से मिलने के पहले का डर...
जिसे वो दुबारा याद कभी नही करेगा,वो सोच रहा था उश सराब का
आनन्द..... जिसकी वजह से उसके पिता की एक्सीडेंट में मृत्यु हुई थी
(वो शराब पी के गाड़ी चला रहे थे ) अब वो क्लास में था और उसकी
परछाई मैदान में शिल्पी से बात कर रही थी I
bahut sunder likha hai aapne, bhavishya ka ped vartman ke bij se hi banta hai, ek request hai , font thode bade kijiye, padhne me asaani rahegi hame
ReplyDeletedhnywad chandrkant ji,mai font bda krne ki koshis karunga.
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