Thursday, February 25, 2010

                                    अध्याय -


                                    जीन

''क्या हाल है छोटू'' पानी के ट्राली पर हाथ मारते हुए शांतनु 
ने पूछा ''१० के छुटे है क्या तेरे पास'' पानी वाले ने जवाब के 
रूप में शांतनु से पूछा ''अबे घोंचू !छुटे होते तो उस भिखारी को 
भीख नही दे दिया होता''  भिखारी की तरफ इशारा करते हुए 
राघव ने कहा '' चल पानी पिला ५ का सिक्का पड़ा है मेरे पास
कल का भी बाकि है तेरा'' ''थोडा सा जीन डाल दूँ '' पानी वाले ने 
आँख मारते हुए पूछा, ''जीन क्या होता है'' शांतनु ने पूछा ''अबे तू जीन 
भी रखता है....... शराब !!! शांतनु की तरफ घूमते हुए राघव ने कहा,
शांतनु हाथ उपर उठाके पानी वाले को थप्पर दिखाते हुए ''कमीने !
मार डालूँगा.... कल हम स्कूल से सस्पेंड होते होते बचे और आज तू 
शराब पिला के क्लास में भेजेगा, अरे यार इससे बदबू नही आती ....
किसी को पता भी नही चलेगा ... तभी तो मेरा धंधा चंगा चल रहा है 
वरना ये ठेला बेच के कब का मै देवरिया चला गया होता, पानी बेच 
के तेरा पेट नही पलता ? शांतनु ने पूछा ''अपना पेट तो पल जाता है 
पर उसका पेट कौन पालेगा, बोल डालूं ?'' सामने रोड के किनारे पुलिस की
जिप्सी की तरफ इशारा करते हुए उसने कहा, हाँ यार मुझे भी पता है 
जीन से बदबू नही आती,राघव ने ललचाई नजरों से कहा,तो क्या कहता
है ? चल मार लेते है एक एक.... फिर मीठी सुपारी लेंगे.शांतनु ने सहमति
मन से कहा, लेकिन पीने के बाद तू अंग्रेजी में तो बात नही करने 
लगेगा,राघव चेतावनी देते हुए बोला I 
          दोनों पीने के बाद ग्लास ट्राली पे रख ही रहे थे की बस आ गई,
सारे बच्चे बस से उतरने लगे,उन्हीं बच्चों में एक शिल्पी भी थी ''ये लीजिए 
इसमें आपके लिए खाना है'' भिखारी को एक टिफिन देते हुए ''और मुझे 
माफ़ कीजिएगा मै आपकी कोई मदद नही कर पाई'' उसकी आँखे भरी हुई 
थी ''क्या हुआ बेटी कल तुम स्कूल नही आई थी'' भिखारी ने शिल्पी की 
तरफ देखते हुए पूछा  ''हाँ बाबा परसों रात कीर्ति नगर टिम्बर मार्केट में
आग लग गई थी, पूरा मार्केट जल गया उसमे मेंरे पापा का भी दुकान 
था'' भिखारी बिना कुछ बोले सर झुका लिया, शिल्पी और ज्यादा देर तक
वहाँ खड़ी नही रह पाई और अंदर की तरफ चली गई,आंसू  आने से उसकी 
आँखे लाल और चमकदार हो गई थी,शांतनु में घूंट पीने के बाद हिम्मत 
आ गई थी वो शिल्पी की तरफ दौरा ''स्क्यूज  मि....!शिल्पी रुकी और 
पीछे मुर के शांतनु की ओर देखी, ''हाय आई एम शांतनु एलेवन्थ क्लास''
''आई एम शिल्पी ट्व्ल्थ'' सुन के शांतनु थोडा मायूस हुआ उसने पहली
बार जिस लड़की को चाहा था वो उससे एक क्लास सीनियर  थी फिर भी 
तुरंत उसने अपने आप को सम्हाला और ''क्या कीर्ति नगर में तुम्हारा भी 
दुकान था.... मैने अभी अभी उस भिखारी को कहते हुए सुना है .....I 
''हाँ वहाँ मेरे पापा का बहुत बड़ा बिजनस था'' शिल्पी ने शांतनु की तरफ 
देखते हुए जवाब दिया, ये मौका शांतनु के जिन्दगी में पहलीबार आया 
था की एक खुबशुरत लड़की उसकी तरफ उसके सामने  भरपूर आँखों से
 देख रही थी, गोल सा चेहरा बड़ी बड़ी आँखें ....सुराही  जैसे गर्दन पर लटकते 
काले काले बाल, वो तो कुछ सेकेण्ड के लिए उस खुबशुरत पड़ी को देखते 
ही रह गया, फिर कहा ''वहाँ मेंरे मामा जी का भी दुकान था'' ''ओह सो sad  
अब तो शायद कुछ भी नही बचा होगा ......., शिल्पी ने मायूसी से कहा 
हाँ'' शांतनु ने सर हिलाया तब तक वहाँ राघव आ गया ''चल भाई घंटी 
बज चुकी  है ....,और दोने वहाँ से क्लास की तरफ चले गए I
         कहते है भविष्य का पेड़ वर्तमान के अंकुर से ही बनता  है, शिल्पी 
के मन में भी आज पहली बार किसी लडके के लिए अंकुर फुटा था,
सायद इशे शांतनु की मासूमियत कहें या जीन का प्रभाव वो आज एक 
खूब शूरत लड़की को प्रभावित कर गया था, उधर शांतनु भी क्लास रूम 
की तरफ जाते हुए मन ही मन बहुत सारी बातें सोच रहा था, वो सोच 
 रहा था  अभी इश समय का एहसास जिसकी खुशियाँ वो सम्हाल
नही पा रहा था .... वो सोच रहा था शिल्पी से मिलने के पहले का डर...
जिसे वो दुबारा याद कभी नही करेगा,वो सोच रहा था उश सराब का 
आनन्द..... जिसकी वजह से उसके पिता की एक्सीडेंट में मृत्यु हुई थी 
(वो शराब पी के गाड़ी चला रहे थे )  अब वो क्लास में था और उसकी 
परछाई  मैदान में शिल्पी से बात कर रही थी I      
    


       
   
      
             

Sunday, February 21, 2010

                                        अध्याय -३


                                        मदर टेरेसा


पानी पिला ! शांतनु पानी वाले पर रौब मारते हुए कहा '' छूटे पैसे हैं'' पानी वाले
 लडके ने उसी अंदाज में दोनों शब्द फेके, शांतनु इधर उधर देखते हुए ''अबे दे दूंगा
यार - एक बात बता रूट नं ८ की बस आई'' ? ''आज मदर टेरेसा नही आई'' पानी
वाले ने गिलास में पानी भरते हुए कहा ''मदर टेरेसा'' !!! शांतनु और राघव दोनों
एक दुसरे की तरफ देखते हुए.... ''मुझे उसका असली नाम नही मालूम है''
पानी वाले ने गिलास बढ़ाते हुए कहा ''मदर टेरेसा'' हा हा हा दोनों जोर जोर से
हंसने लगे, पानी वाले ने भी हंसने में उनका साथ दिया ''आज छुटे नही है कल ले
लियो'' कह कर दोनों तेजी से गेट के अंदर चले गये I

     ''वो देख यार काली पल्सर'' राघव ने स्कूल के पार्किंग में खड़ी एक मोटरसायकल
की तरफ इशारा करते हुए कहा ''चल साले का हवा निकाल देते हैं'' शांतनु पीठ पर
से स्कूल बैग उतारते हुए कहा और बाईक के पास पहुँच गया, ''मै तो अगले टायर
में चाकू मार दूंगा'' राघव दाँत कीचते हुए कहा ''साला आज से लडकियों को लिफ्ट
देना भूल जायेगा- शांतनु.... देख यही है न वो सीट जिसपे उसने मेरी सायरा को
बिठाया था'' राघव सीट पर चाकू से आठ दस वार करते हुए कहा ''बस यार सीट
फट गया .... मेने अगले पहिये का हवा निकाल दिया तू  पिछले पहिये का निकाल
और भाग यहाँ से'' शांतनु हाथ झारते हुए कहा  '' कल से साला लड़की पटाना
तो दूर स्कूल में पढना भी छोड़ देगा''राघव पिछले टायर के पास बैठते हुए कहा,
इतने में एक चटाक की जोरदार आवाज के साथ वो  जमीन पर गिर गया I
पीठ सहलाते हुए ऊपर देखा तो उसके होश उड़ गए, सामने साइंस के टीचर वी सी
दत्ता थे,तब तक एक गार्ड भी वहाँ दौरते हुए आ पहुंचा, ''तुझे मेरी मोटरसायकल ने क्या
बिगारा था'' मि.दत्ता ने चीखते हुए पूछा, राघव जमीन पर हाथ टेकते हुए उठा और
दाई ओर शांतनु की तरफ देखा पर वो तो जैसे वहाँ से वाष्प बन कर उड़ चूका था,
''सर.. सर..... मै नहीं वो.. तो...'' चटाक... दूसरा चाटा ''सर टायर से हवा भी निकाल
दिया है'' गार्ड ने धीरे चापलूसी से कहा ''क्या नाम है तेरा ....'' सर स .. सारी सर ...
मै..'' राघव कांपते हुए मिन्नत करना चाहा ''आई से वाट इज योर नेम...'' मि दत्ता
फिर चीखे , अचानक राघव के दिमाग ने विपरीत परिस्थिति मै भी शरारती आदत  जोर
मारा ''स सर माई नेम इस जवाहर सिंह''   ''गेट आउट फ्राम दिस स्कूल'' मि दत्ता ने
गेट की तरफ इशारा करते हुए कहा, स्कूल से टन टन टन की आवाज आई
और सारे बच्चे अपने अपने क्लास की तरफ भागे I

      बाहर शांतनु राघव का इंतजार कर रहा था ''अबे यार उस बूढ़े ने कब बाइक
ले ली'' राघव हारे हुए इन्शान की तरह बैग निचे रखते हुए कहा ''१० तारीख को
उसके बेटे की शादी थी ये पल्सर उसी के दहेज मै आया होगा'' शांतनु बोला
''पर उसका बेटा तो विकलांग है और बैसाखी के सहारे चलता है'' उसने संदेह
जताते हुए कहा ''राघव ! तू समझेगा नही...  दहेज लड़का नही चाहता कभी,
उसके माँ बाप को दहेज चाहिए होता है... चल छोड़ ज्यादे तो नही लगी ...''
''ज्यादा लगी तो नही पर उसने अब तक सायद स्कूल से मेरा नाम काट
दिया होगा'' राघव ने उदास होते हुए कहा ''तो क्या उसने तेरा नाम और क्लास
भी पूछा था ???'' ''हाँ यार ... पर डरने की कोई जरूरत नही''....... राघव ४-५
सेकेण्ड के लिए चुप हो गया   मैने दत्ता को गलत नाम और क्लास बता दिया
हा हा ..... हा .....दोनो ने  एक दुसरे के हाथ पे हाथ मारा और हंसने लगा I        
                    
      
              
     



    

Sunday, February 7, 2010

                                                      
                                             अध्याय - २


                                        '' टिम्बर मार्केट''


हेलो - हेलो ......! फायर बिग्रेड ...! हेलो ... एक सरदार मोबाईल से ...'' ऐ साले फ्री वाले
नम्बर होंदे ही ऐसे हैं'' ......! दुबारा से ''हेलो फायर बिग्रेड'' ओह बेटरी खत्म सरदार मोबाईल
को जोर से सर से टकराते हुए कहा और सामने देखा तो उसकी आँख फटी की फटी रह
गई, ''ओए मेरे स्टोर मै भी लग गई''.... और जोर से चिल्लाते हुए आगे की तरफ दौरा.
आग धीरे -धीरे बढ़ता ही जा रहा था कुछ ही समय मै आग पुरे टिम्बर मार्केट में
फैल गया और सब कुछ धू धू कर जलने लगा.कुछ कुत्ते और ढेर सारे चूहे इधर उधर
भाग रहे थे,बहुत दूर से सायरनों  की आवाज -लकड़ी एवं कार के जलने की बदबू
माहौल को और भी भयानक बना रहा था,समूचा कीर्ति  नगर टिम्बर मार्केट तेल
की तरह जल रहा था चारो तरफ त्राहि-त्राहि मची थी,एसा लग रहा था जैसे
ईस्वर आज  ही सब कुछ करने वाले है,किसके साथ न्याय किसके साथ अन्याय,
किसको सजा किसको माफी,किसको जीवन किसको मृत्यु,इशी बीच एक पूंछ जलता
हुआ कुत्ता (शायद उसकी पूंछ किसी गाड़ी से निकले पेट्रोल मै भींग गई थी और
उसमे आग लग गई थी) कही से दौरता आया ... वो दौर दौर के उस पूंछ मै
लगी आग से पीछा छुड़ाना चाहता था वो उसपर कई बार मुंह मारा 
और मुंह जलने पर कांय -कांय की आवाज करता दूसरी तरफ भाग गया.
कुछ रुढीवादी और धार्मिक प्रवत्ति वाले लोग कुत्ते को हनुमान का रूप मानकर
शहमे खड़े हाथ जोड़ लेते थे,सायद हनुमान जी ही कुत्ते का रूप धारण कर आग
लगाये होंगे.बहुत दूर खड़े सारे दकानदार और फेक्ट्री वाले अपने -अपने मॉल
का होम होते देख रहे थे और सबके सब मोबाईल अपने कान में लगाए थे ,
कुछ लोग सुभ सुचना अपने घर में दे रहे थे तो कोई बेहद दुखद. जिसके दुकान
में आज ज्यादा माल था वो बहुत दुखी था जिसके दुकान में कम माल था वो
अभी से केल्कुलेसन लगाने लग गया था क़ि ५ लाख का माल जला है
५० लाख का क्लेम मांगूंगा २५ लाख तो मिल ही जायेगा , उन्ही दुकानदारों
में से एक अशोक मेहरा नाम का दुकानदार फोन पे बात करते करते बेहोश
होके गिर पड़ा,हमेशा क़ि तरह सबकुछ हो जाने के बाद एम्बुलेंस,पुलिस
और सबसे अंत में फायर बिग्रेड क़ि खटारा गारियाँ आई और राख को
कीचर में में तब्दील करने लगी,अब बारी थी मिडिया बालों क़ि जो दिन
भर टी वी में विज्ञापन दिखा के बोड़ हो गये थे वे लोग  उश कीचड़ में फुटबाल
खेलने लगे ''ये देखिये जली हुई लकड़ी... ये कैसी लग रही है'' एक लड़की
रिपोर्टर केमरा को दिखाते हुई बोली ऐसे जैसे वो जली लकड़ी नही बल्कि
चाँद या मंगल ग्रह से लाया हुआ कोई खास पत्थर हो, कम से कम २०-२५
न्यूज चेनल का लाइव टेलीकास्ट वैन आ गया और चारो तरफ से मार्केट
 को जाम कर दिया.उश अग्नि कांड में कुछ लोग जख्मी हुए थे और एक
आदमी क़ि मृत्यु हो गई थी,यह खबर पूरी दिल्ली में आधे घंटे में फैल
गई.आग कैसे लगी ये किसी को पता नही लगा, अगले दिन अख़बार में
बस यही छपा क़ि  मुख्य मंत्री ने अग्निकांड के जाँच के आदेश दे दिए है.             

                     
    

Tuesday, February 2, 2010

हर जनम (एक लघु उपन्यास)

                                 अध्याय - १


                                                         (चेरिटी)
         


कहते है पहली  मुलाकात दिल पे एसा असर डालता है कि वो मुलाकात
 और उसका असर मन में हमेशा के लिए रह  जाता है.सांतनु पहली बार 
शिल्पी को चेरिटी करते हुए देखा था. ''आह'' भिखारी के मुंह से आवाज 
आई और उसका कटोरा हाथ से गिर कर सड़क पे लुढकने लगा,स्कूल
बस से उतरते हुए शिल्पी ने वो 'आह' और कटोरा लुढकने कि आवाज 
सुनी, वो भिखारी हमेशा स्कूल के गेट के पास एक लकड़ी की ट्राली में
बैठे भीख मांगता रहता था, उसका एक पैर और एक हाथ नहीं था 
उसके पैर में कभी नहीं छूटने वाला एक घाव था जिस पर हमेशा
मख्खियाँ मडराती रहती थी शिल्पी आवाज सुनकर मुड़ी उसने देखा की 
भिखारी को कुछ दर्द महशुस हो रहा है उसका काटोरा उससे दूर पड़ा 
है जिसे वो उठाने की की कोशिस कर रहा है वो उसके पास गयी और 
कटोरा देते हुए 'आप को क्या तकलीफ है कराह क्यों रहे है आप'  'इसमें
मेरा घाव दब गया था' ट्राली की एक नोंक की तरफ इशारा करते हुए 
उसने कहा, शिल्पी उसके घाव की तरफ लाचारी भाव से देखते हुए बोली 
आप इसमें कोई दवाई नही लगाते ?..... दवाई बहुत महगी है बेटी
मै इसमें शुती कपड़े का राख लगाता हूँ, शांतनु और उसका दोस्त 
रघाव, पास में पानी वाले के साथ छुट्टे के लिए लड़ता  हुआ  ये सब देख 
रहा था '२ गिलास  पानी पिया १० का नोट दे रहा है' १०-११ साल के पानी 
बेचने वाले लडके ने गुस्से से कहा 'अबे पूरा ट्राली पी जाऊ क्या सूबे -सूबे 
राघव ने उसी अंदाज में उससे कहा 'यार तू दो रुपया काट ले अकड़ मत,'
शांतनु ने शांति से कहा, शिल्पी अपने स्कूल बैग से एक ५० का नोट
निकाली और भिखारी की तरफ बढ़ाते हुए 'ये लीजिये मेरे पास ५० 
रूपए पड़े है इससे आप दवाई ले लिजियेगा और हाँ आप कोई काम 
कर सकते है मेरा मतलब नौकरी...!' भिखारी नोट पकरते हुए ऊपर ऐसे 
देखा जैसे उसके सामने कोई देवी खड़ी हो और उसे वरदान मांगने को 
कह रही हो 'मेरे पापा का कीर्ति नगर में टिम्बर का काम है आप चाहें 
तो वहाँ दिन में लकड़ियों की चौकीदारी का काम कर सकते है' शिल्पी 
 पुरे आत्मविश्वास से बोली 'ये ले पकड़ ९ रूपये, लडकियों को देखता है 
  साला आंख का पावर कम हो जायेगा' पानी वाला एक भींगा ५ का 
नोट और कुछ छूटे देते हुए कहा,शांतनु  बिना गिने पैसे को उपर के जेब 
में फेक दिया,ऐसे जैसे कोई टिसू पेपर को इस्तेमाल के बाद फेकता है, 
'पैसे पुरे थे न...! चल एक गिलास पानी और पिला'  शांतनु शिल्पी की
 तरफ देखते हुए कहा,पानी वाला शांतनु को घूरते हुए पानी निकालने
लगा,दरअसल शांतनु को वहाँ खड़े रहने के लिए और एक गिलास  पानी 
पीने के अलावा कोई और बहाना नहीं था.'आप कहें तो मै पापा से बात 
करूं 'शिल्पी आशापूर्ण नजर से भिखारी की ओर देखते हुए बोली 'बेटी 
बड़ी मेहरवानी होगी तुम्हारी और तुम्हारे पिताजी की यदी मुझे वो काम 
मिल जाय'. उसने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा 'मै आज ही पापा से बात 
करूंगी' कहके शिल्पी अपने  दो और शहेलियों  के साथ तेजी से गेट के 
अन्दर चली गई.
     'भिखारी जेनुअन लगता है यार' वरना डेड दो हजार की नौकरी लिए
कोई भिखारी भीख मांगना क्यों छोड़ेगा वो भी दिल्ली का भिखारी.' राघव 
अपने दाएँ गाल को एक ऊँगली से खुजाते हुए कहा 'मुझे तो वो 
लड़की उससे भी ज्यादा जेनुअन लगी यार, शांतनु मन ही मन सोचा,
और बोला 'हाँ यार वाकई मजबूर भिखारी लगता है' उसने आधा गिलास
बचा हुआ  पानी और एक अठन्नी ट्राली पर पटकते हुए कहा चल भाई
 हम लेट हो रहे है घंटी बजने बाली है. शांतनु स्कूल के अन्दर जाते हुए
  भी मैदान मे  उसी दयालु लड़की को ढूंढ रहा था.