जय हिंद
दोस्तों आज हम भारतीय गणतन्त्र के ६१ वें साल में कदम रख चुके
हैं, ६० साल बीत चूका है, निस्संदेह हम इन ६० सालों में सुई से लेकर
हवाई जहाज तक बनाने लग गये, विदेश पर निर्भरता काफी हद तक कम
हो गई है, देश समृद्ध हुआ है,मध्यम तबके के लोग धनी - धनी लोग
उद्योगपति और कल के उद्योगपति आज कुबेर है,
मैं आज ६१ वें साल भारतीय गणतंत्र पर इल्जाम लगाने जा रहा
हूँ, गांधीजी के शब्द थे ''भारत गांव का देश है'' ये वो वाक्य है जो हमें
स्कूल में भी पढाया गया था,इश वाक्य की तुलना मैं एश्वर्या राय के
उस वाक्य से करूँगा जो उन्होंने विश्व सुन्दरी प्रतियोगता के दौरान कही
थी ''मैं अपने आँखों का दान इश लिए करना चाहूंगी कि कोई अँधा भी
इश खूबसूरत दुनियां को देख सके'' खूबसूरत दुनियां जी हाँ ---------!
एक शहर में रहने बाली २० साल कि लड़की - जिसके हिसाब से ये
दुनियां खुबशूरत है,उसी क़ी उम्र कि एक गांव में रहने वाली बूढी माँ,
जो कुपोषण का शिकार हो कर मृत्युशय्या पर पड़ी है से हमारे समाज
ने या सारकार ने आज तक पूछा है? क़ी ये दुनियां कैसी है? दुनियां क़ी
बात तो छोरिये उससे तो किसी ने आज तक ये नहीं पूछा क़ी हास्पिटल
कैसा होता है,स्कूल कैसा होता हैं,पक्की सड़क कैसी होती है, जो देश
गांव में रहता है जिस पर देश का वजूद टिका है क्या वो आज तक
खुबशुरत हुआ है ? क्या गांव में आज तक मुजिकल फव्वारा बना है,
किसी एम्युजमेंट पार्क का निर्माण हुआ है,क्या किसी निर्जन और निधन
आदिवासी इलाके में मल्टी स्पेसियेलिती हास्पिटल बना है ??? इन
सम्पन्न चीजों को तो जाने दीजिये - यहाँ तक क़ी बुनियादी जरुरत जैसे
बिजली पानी सडक तक क़ी व्यवस्था आज तक नहीं हो पाया है- ये भी
जग विदित है क़ी देश के कई भागों में लोग भूख मरी के चपेट में है 1
बड़ी विडंबना है क़ी शहर क़ी एक १८ साल क़ी लड़की कंडोम क़ी ब्रांड
एम्बेसडर बन जाती है और उशे हाथ में लेकर टी वी पर व्यापारिक विज्ञापन
करती है वहीँ गांव का एक तीस -चालीस साल का व्यक्ति परिवार नियोजन
का तरीका तक नहीं जनता. इतना फर्क शहर और देहात में ???.
निश्चय ही हम तरक्की के रास्ते पर नहीं है साठ साल कम नहीं
होते,यदि सरकार या पब्लिक ये सोचती है क़ी हम अब परमाणु संपन्न देश
हैं और हमें अपने देश पर गर्व करना चाहिए तो मैं कहता हूँ वो गलत
हैं, गांव,देहात और पिछरे इलाके के आदिवासी जिस हालत में ७० -८०
साल पहले जीते थे उशी हालत में आज भी जीते हैं,उन्होंने आजादी शब्द सुना
जरुर होगा लेकिन महशुस कभी नहीं किया, उन्होंने तिरंगा को देखा
जरुर है लेकिन आजादी के रूप में नहीं एक कपड़े के रूप में, वो किस खुसी
में गणतंत्र दिवस मनाएं, सारकार और समाज को चाहिए क़ी देहात को
भी विकास का सामान अवसर दे, क्योकि जो उन्मुक्क्त आजादी न दे वो
देश कैसा - और जो न्याय सम्मान एवं अनंत अवसर न दे वो सारकार
कैसा.
जय हिंद,
मेरा भारत महान नहीं कहूँगा.......................................................
Tuesday, January 26, 2010
Sunday, January 17, 2010
रिश्वत के देवता
आज कल नित नये दिन अख़बार में खबर छपता है कि अमुक व्यक्ति ने फलाने चेरिटेबल ट्रस्ट को ५० लाख दान में दिए,फलां अभिनेता को उश चेरिटेबल ट्रस्ट का
अम्बेसडर बनाया गया है,किसी दिन सुनने को मिलता है तिरुपति बालाजी को किसी
भक्त ने सवा करोड़ रूपये दान में दिए,कभी सिरडी सांई को लाखो के स्वर्ण आभूषण
मिले,
जागो हे रिश्वत के देवता - जागो, और अपने परम प्रिय और सम्पन्न भक्तों को बता दो कि में मंदिर मस्जिद में नहीं रहता हूँ,रूपये पैसो में मेरा मोह नहीं है क्योंकि मुझे
रोटी नहीं खाने परते, कपडे नहीं पहनने पड़ते , घर नहीं बनाने परते, इन रूपये पैसो कि
जहाँ जरुरत है वहां दो,बड़े ही दुर्भाग्य कि बात है कि जिस देश का राजा प्रजा है उस
देश में भी प्रजा भूखे मरता ,कहीं एक -एक दाने के लिए लोग तरसते है कही सोने के
सिक्के मंदिर में चढ़ाये जाते हैं ,एक कोशोर बेटे को स्कूल भेजने कि जगह पिता
मजबूरन दूर शहर मजदूरी के लिए भेजता है,बेटी कि व्याह करने कि जगह बाप
किसी दलाल के हाथ बेचना उचित समझता है,कहीं हाहाकार मचा है कहीं हा-हा हो रहा है.... जागो हे रिश्वत के देवता..............
मंदिर तेरा मस्जिद तेरा,
गुरूद्वारे और गिरिजाघर,
नेता की कोठी को देखा,
बाबू बनाया अपना घर,
आन बान और शान बनाया,
बनियाँ देखे डंडी पर,
रिश्वत के ईस्वर मंदिर छोडो,
जा तू दीन के धरती पर,
Tuesday, January 5, 2010
वादियाँ
साथ चलते रहे दूर तक,
ये धरती ये अम्बर जहाँ तक,
ये नज़ारे ये सितारे,
ये चंदा ये चितवन ,
क्या चंचल है मौसम,
छेरे उसे बादल दूर तक,
नादान तुम नादां हें हम
अनजान तुम अनजान हम,
ये झरना न नादान है,
बल खा के चलती है,
पपीहों को छेरती है ,
पागल पवन दूर तक ,
मुकुट पहना ये पर्वत,
नदियों कि कलरव,
सूरज की किरने ,
सोने के गहने,
बहती है चलती है,
गले सबसे मिलती है,
फूल हो या पत्थर,
साथ चलते रहे दूर तक,
साथ चलते रहे दूर तक ,
साथ चलते रहे दूर तक,
ये धरती ये अम्बर जहाँ तक,
ये नज़ारे ये सितारे,
ये चंदा ये चितवन ,
क्या चंचल है मौसम,
छेरे उसे बादल दूर तक,
नादान तुम नादां हें हम
अनजान तुम अनजान हम,
ये झरना न नादान है,
बल खा के चलती है,
पपीहों को छेरती है ,
पागल पवन दूर तक ,
मुकुट पहना ये पर्वत,
नदियों कि कलरव,
सूरज की किरने ,
सोने के गहने,
बहती है चलती है,
गले सबसे मिलती है,
फूल हो या पत्थर,
साथ चलते रहे दूर तक,
साथ चलते रहे दूर तक ,
साथ चलते रहे दूर तक,
Saturday, January 2, 2010
यदा यदा ही धर्मस्य
पुराने ज़माने कि बात है किसी भूभाग पर दो राजा राज करते थे उन दोनों राजाओ के बीच
हमेशा राज्य कि सीमा को लेकर विवाद रहता था,दोनों ही रजा एक दुसरे के राज्य के अन्दर अपनी सीमा बताते
थे पीछे हटने का कोई नाम न लेता था,इश वजह से एक बार युद्ध छिर गया बहुत ही घमासान लड़ाई हुई, बहुत सारे
निर्दोष प्रजा मारे गए ,यह देख कर क्रुद्ध प्रजा ने एक दिन युद्ध के ही मैदान में दोनों राजाओ को घेर कर अंत कर
दिया. राजाओ के मरते ही मातम के जगह हर्ष आ गया सब लोग आपस में गले मिलने लगे,लोगो ने दोनों ही राजा को
एक ही जगह पास पास संस्कार कर दिया और समाधि बना कर बीच में एक बाबुल का पेड़ लगा दिया, ताकि
भविष्य में कोई उन क्रूर रजा के समाधि के पास न जा सके.
कहते है जीवित रहते अच्छे कर्म करने से मृत्युबाद आत्मा को सुख शांति मिलती है,लेकिन ये बात कोई नहीं
जनता कि मरने के बाद हमारा क्या होता है पर इतना तय है कि हमारे अच्छे कर्म करने से समाज कि संवेदना
मृत्युपर्यंत हमारे साथ रहती है.तभी तो समाधि पर कोई दिया जलाता है कोई पुष्प चढ़ाता है कोई तुलसी तो कोई
बरगद का पेड़ लगाता है ताकि कभी बहुत सारे लोग उस पेड़ के निचे थकान मिटा सके, रजा के मृत्यु का समाचार सुन कर कुम्हार जिसे राजा ने बिना किसी दोष के देश निकला दे दिया था, वापस आया तो देखा दोनों राज्यों को
फूलो से सजाया जा रहा था जगह जगह ढोल नगारे बज रहे थे दिवाली सा माहौल था,अगले दिन दोनों राज्यों को
मिलकर एक राज्य बनाना और नए राजा का चुनाव होना था,कुम्हार फिर भी डरा हुआ था उसे विश्वास नहीं हो रहा था
कि राजा अब नहीं है लेकिन जब उसकी पत्नी और बच्चे जो उनसे १५ साल बाद मिल रहे थे, ने कहा तो उसे विस्वाश हो गया .कुछ देर कुम्हार राजा के बरे में सोचता रहा फिर अपने बच्चो से बोला राजा आखिर राजा होता है चाहे वो क्रूर और पापी क्यों न हो वो जैसा था वैसे सजा उसे मिल गयी.अब मुझे उन्हें श्रधांजलि देने के लिए जाना चाहिए और वो पहुच गया समाधि पर,वहां उसने देखा दोनों राजा सुच्म शरीर में रहते हुए भी बबूल पेड़
कि थोरी सी छांव के लिए लड़ रहे है,उश छांव के लिए जिस पर किसी का अधिकार नहीं हो सकता, जो सूर्य कि
रोशनी के साथ जगह बदलता है. उश पेड़ पर एक प्रेत ने डेरा डाल रक्खा था वो दोनों का झगरा बरे चाव से देख रहा
था,यह देख कर कुम्हार बोला आप इन दोनों को आपस में समझौता क्यों नहीं करा देते,प्रेत ने जवाब दिया- मै झगरा देख नहीं झगरा करवा रहा हूँ ताकि तुम अपने बच्चों के साथ शांति से रहो.
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