Thursday, December 31, 2009


                                                लौह की  कलम हो


लौह की कलम हो रक्त की दवात हो,
चट्टान की दीवार पे भविष्य की बात हो, 
उसर कोई पठार हो मै जो तेरे साथ हो,
पहार पे कमल खिले महक की बात हो, 
विवेक द्रष्टिहिन  हो मगर कोई कुलीन हो, 
सितारे रात साथ हो अंधकार की बात हो, 
अधर न कोई नाम हो काम ही काम हो, 
ईश न कोई साथ दे गीता की जो बात हो, 
समुद्र में उफान हो काल दंभ जवान हो,  
धीर इंतजार हो- लक्ष की जो बात हो ,
कठोर मौन ब्रत हो धरा अनंत त्रश्त हो, 
 गंग सम वर मिले भागीरथी की बात हो. 
सूर्य कोई लाल हो दिन भी कोई काल हो, 
गो धूलि प्रहर रहे कालाहारी की बात हो. 
लौह की कलम हो .......!   

Saturday, December 26, 2009


                           संतुस्ट बनाम असंतुस्ट
     
मै दिल्ली से जयपुर जा रहा था बस से,मेरे से पिछले सिट पर दो सज्जन बैठे थे.
उनकी बातो से लग रहा था कि वो लोग बचपन के दोस्त हैं,और कुम्भ के मेले में
बिछुर गए थे, अब १५ सालों के बाद मिले है. वो अंतिम बार जब मिले थे तब दोनों
एक ही कम्पनी में काम करते थे. मैं उन लोगो की बात बरे ध्यान से सुन रहा था.
उनकी बातो से आगे पता चला कि उन में से एक अब भी उसी कंपनी में काम कर
रहा है,और तब उसका वेतन ६५०० था अब १८००० हो चूका है.उसके उलट दुसरे
व्यक्ति जो १५ साल पहले काम छोर कर चला गया था और कई कंपनियों में काम
करते हुए अब अपना काम सुरु कर लिया है इस समय उसकी कमाई करीब करीब
डेढ़ लाख रूपये प्रति माह है.मेरे दिमाग में संतुष्ट और असंतुष्ट इन दोनों शब्दों ने
एक साथ जन्म लिया,
       मैंने आज तक जो भी साहित्य या धार्मिक ग्रन्थ पढ़ा है या सुना है उसका
सार यही था कि संतुष्टि में ही जीवन का मूल आनंद है,इश लिए थोरे में ही इन्शान
को संतुस्ट रहना चाहिए,इसका उदाहरण मेरे सामने था लेकिन अगले ही पल एक
 बात और मेरे मन में आई कि ये आदमी जिस बस में सवार हो कर जयपुर जा
रहा है,वह टाटा कंपनी  कि बनाई हुई है इशी आदमी कि तरह यदि जे आर डी टाटा
भी अपने युवा कल में ही संतुस्ट हो गए होते तो हम लोग आज सायद बस कि  -
बजाय बग्गी में सफ़र कर रहे होते.और टाटा सिर्फ एक बस कि कम्पनी स्थापित
कर के यदि संतुस्ट हो गए होते तो आज उन लाखो करोरों परिवार का क्या होता
जो उस कम्पनी में काम पर रहे हैं या टाटा से किसी  तरह से जुरे हुए है.
      कहते है आवश्यकता आविष्कार कि जननी होती है, इसलिए आदमी को निरंतर
आवश्यकता मह्सुश करते रहना चाहिए और उसको पाने के लिए हमेशा प्रयत्नशील
रहना चाहिए.आज कल के तेजी से भागती जिन्दगी में असंतुस्ट रहना ही सफलता
कि सीढ़ी है अपना लक्ष्य हमेशा ऊँचा रखना चाहिए.लेकिन ऐशा नहीं है कि संतुस्ट
शब्द का हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं है संतुष्ट का मायने मेरे हिशाब से अलग है
जैसे हम किसी काम को शुरू करते है उस काम को सफलता पूर्वक ख़तम करने पर
हमें खुसी से उछलना नहीं चाहिए बल्कि हमें अपनी संतुष्टि रूपी सहमति प्रदान करनी
चाहिए और आगे के काम में जुट जाना चाहिए.              

Wednesday, December 23, 2009

musafir



था मुसाफिर दूर दिन रात  वो चलता रहा,
गा रहा था गीत औरो से जो सुनता रहा,
मीत नहीं था प्रीत का ख्वाब वो बुनता रहा,
फ़िक्र न था झुर्रियों का पसलियाँ  ढोता रहा,
मठ मिला था साधु को जब हाथ वो मलता रहा,

Monday, December 14, 2009

वक्र तुंड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ I
निर्बिघ्नाम कुरु में देव सर्वकार्येसु सर्वदा II