‘तेरा स्वेत आँचल’
माँ मैं जानता हूँ तू क्या सोचती है मेरे लिए,
मैं जानता हूँ तू क्या चाहती है मेरे लिए,
तेरी अस्क भींगे कपोलों को देख रही है दुनियाँ,
इश दुनियाँ के उन धक्कों से कब तक मुझे बचाएगी,
माँ कब तलक मुझे सहलाएगी I
यहाँ की अगम अपार गहराई में गोते मुझे लगाने दे,
छोर दे मुझे,जाने दे दूर मुझे जाने दे,
तू सब जानती है, जीवन का मर्म समझती है,
कब तक मुझे रोक पाएगी,
माँ कब तलक मुझे सहलाएगी I
जानता हूँ शिशु हूँ तेरा वही,
मानता हूँ मतिहीन हूँ फिर भी,
चोट सह लेने दे खा लेने दे भाले,
इश असह्य पीड़ा को कब तक भरमाएगी,
माँ कब तलक मुझे सहलाएगी I
तू जानती है धरती की भी अपनी रीत है,
जहाँ संघर्ष ही मनुज का मीत है,
रम जाने दे इन आबो हवा में,
पी लेने दे कुछ घूंट आंशुओं के,
अपनी स्वेत आँचल में कब तक मुझे छुपाएगी,
माँ कब तलक मुझे सहलाएगी I
क्या नहीं दिया तुमने तेरी ममता ने,
क्या नहीं देखा तेरे चेहरे के आईने में,
यशोदा ने पुत्र के मुंह में देखी थी संसार,
मैं तेरी हृदय में देखता हूँ गीता सार,
तेरी निर्मल आशीष के बिना क्या मुक्ति मुझे मिल पाएगी,
माँ कब तलक मुझे सहलाएगी I
माँ कब तलक मुझे सहलाएगी I
bhawbhini......bahut achchi lagi.
ReplyDeleteDhnywad mridula ji...
Deleteबहुत सुंदर भाव...............
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