Thursday, December 30, 2010

                                      ये क्या हो रहा है


इक्कीसवीं सदी का प्रथम दशक जा रहा है, तमाम घपलों घोटालों के बीच हमने 
 इशी दशक में 2020 तक  विकसित देश होने का लक्ष  रक्खा था, पर क्या सचमुच 
हमने कोई लक्ष रख्खा था ? उसे पूरा करने के लिए हमने कोई प्रयास किये.....?
जवाब नहीं में ही होगा, दरअसल हम शहरों का शहरी करण करते जा रहे हैं 
गाँव और देहातो का विकास नहीं,सरकार G D P को विकास का पैमाना मान
रही है लेकिन सच्चाई कुछ और है, इश तस्वीर को देखिये, ये एक स्कूल की तस्वीर   
  है,कौन कहेगा अगले दस सालों में हम विकसित देश बनने जा रहे है,  

राजनीती में भी नंगा नाच ही हो रहा है चाहे वो  पक्छ  हो या विपक्च्छ  सब अपनी
अपनी राजनीती  कर रहा है हाल ही में 2 G स्पेक्ट्रम घोटाले को ही ले लीजिये
NDA  जे पी सी की मांग कर रहा है और UPA जे पी सी के लिए किसी भी कीमत
पर तैयार नहीं है चाहे संसद चले या नही, दोनों पक्षों के जिद ने पुरे शीत कालीन
शत्र को हंगामे की भेंट चढ़ा दिया, दोनों में से कोई भी पार्टी देश के बारे में नहीं सोच
रही है, मैं पूछता हूँ आखिर 'जे पी सी'  की इतनी बड़ी  क्या जरूरत है की N D A अड़ा
हुआ है ,देश ने अब तक तीन 'जे पी सी' को देखा है चाहे वो बोफोर्ष का मामला हो
या हर्षद मेहता कांड, दोनों - तीनो मामले में 'जे पी सी' ने केस का क्या बिगाड़  लिया,
इश हंगामे से अच्छा एक काम नही हो सकता  की लोकसभा  अध्यक्ष दोनों पार्टी
को बुला कर  बीच का रास्ता निकलतीं और यह केस सीधा सुप्रीम कोर्ट के स्पेशल बेंच
को सौंप देती और एक अध्यादेश के द्वारा छ: महीने में फैसला सुनाने को कहती
ताकि देश को तुरंत न्याय मिल सके और दोसी को सजा, राजनीती के इश तरह के
रवैये से हम 10 साल तो क्या अगले 50 सालों  में भी विकसित नही हो सकते,
ये मेट्रो,लो फ्लोर बसों और कुकुर मुत्तों की तरह निजी  शिक्षण संस्थानों से विकास
नही होता ,देश के चहुमुखी विकास के लिए जरुरी है की सरकार कम से कम सरकारी
उद्यमों को वहाँ लगाये जो जिला अत्यंत गरीब और उपेक्षित है वहाँ सुविधा एवं साधन
उपलब्ध कराए ताकि सरकार के देखा देखी निजी कम्पनियां भी वहाँ जाए,लोगों
को अपने गृह क्षेत्र में ही रोजगार मिले ताकि शहरों की तरफ पलायन रुके,